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सोमवार, 20 मार्च 2017

गीत "कैसे बचे यहाँ गौरय्या!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आज विश्व गौरय्या दिवस है!

खेतों में विष भरा हुआ है,
ज़हरीले हैं ताल-तलय्या।
दाना-दुनका खाने वाली,
कैसे बचे यहाँ गौरय्या?

अन्न उगाने के लालच में,
ज़हर भरी हम खाद लगाते,
खाकर जहरीले भोजन को,
रोगों को हम पास बुलाते,
घटती जाती हैं दुनिया में,
अपनी ये प्यारी गौरय्या।
दाना-दुनका खाने वाली,
कैसे बचे यहाँ गौरय्या??

चिड़िया का तो छोटा तन है,
छोटे तन में छोटा मन है,
विष को नहीं पचा पाती है,
इसीलिए तो मर जाती है,
सुबह जगाने वाली जग को,
अपनी ये प्यारी गौरय्या।।
दाना-दुनका खाने वाली,
कैसे बचे यहाँ गौरय्या??

गिद्धों के अस्तित्व लुप्त हैं,
चिड़ियाएँ भी अब विलुप्त हैं,
खुशियों में मातम पसरा है,
अपनी बंजर हुई धरा है,
नहीं दिखाई देती हमको,
अपनी ये प्यारी गौरय्या।।
दाना-दुनका खाने वाली,
कैसे बचे यहाँ गौरय्या??

4 टिप्‍पणियां:

जयन्ती प्रसाद शर्मा ने कहा…

बहुत सुन्दर गीत।

pushpendra dwivedi ने कहा…

वाह बहुत खूब बेहतरीन रचनात्मक अभिव्यक्ति

radha tiwari( radhegopal) ने कहा…

सुन्दर सृजन

VenuS "ज़ोया" ने कहा…

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'जी
सादर नमस्ते

खेतों में विष भरा हुआ है,
ज़हरीले हैं ताल-तलय्या।
दाना-दुनका खाने वाली,

सटीक बात कही आपने। . किसान बेचारा पैदावार बढ़ाकर कुछ और पासी कमाने के चक्क्र में पढ़ चूका हैं। .. वो भी क्या करे ...हम्म्म
कड़वी और सार्थक रचना


अपनी लेखन को हम सब से साझा करने के लिए आभार


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